अपने शहर में पराए से !!

- जितेंद्र दवे 
ज़िंदगी भी ना जाने कैसे कैसे रंग दिखाती है !!  आज बहुत दिनो बाद गांव से मुम्बई लौटा तो अपनी सोसायटी में घुसते ही नवनियुक्त वॉचमेन ने मुस्तैदी से मुझे रोककर पूछा,.. कहाँ जाना है?”  मैने कहा फोर्थ फ्लोर पे वॉचमेन- किससे मिलना है ?” मैं- क्या मतलब किससे, मेरा घर है भाई?” 
वॉचमेन- आज से पहले तो कभी देखा नहीं नहीं??” 
मैं कुछ समझाता इससे पहले ही सोसायटी के मिस्टर सुकुमार मॉर्निंग वॉक करते हुए आ पहुंचे. और कहने लगे..अरे दवे बहुत दिनो बाद, गांव गये थे क्या..?’ 
वॉचमेन ने माज़रा समझ के सलूट ठोका और अपने ही घर में दाखिल हो सके. 
खैर, अर्से बाद आइना देखे तो हमें अपना चेहरा भी पराया सा लगता है.ये तो शहर है बेचारा, भीड, भीड और बस भीड से भरा. यहाँ चेहरे कहाँ, चेहरो को याद रखने, उनकी तसदीक करने की फुरसत कहाँ. वक्त अपनी रफ्तार से भागता जाता है, कुछ चेहरे खोते चले जाते हैं, नये आ धमकते हैं. और हमें लगता है कि शहर नया ताज़ातरीन है. वक्त की मार में दफ्न हुए चेहरो के नाम मर्सिया के लिए भी वक्त नहीं है हमारे पास. आखिर हम भी तो वक्त के मारे हैं. किसे दोष दे. 
कुछ देर बाद, ब्रश, स्नान करके सफर की थकान से बदला लेने सुस्ताने को जा ही रहा था कि जूनियर बिस्तर से उठकर टांगो से लिपट गया,बोला पापा वो बाहुबली वाली तलवार लाओ ना, वंश (उसका दोस्त) के पास भी है’. मैने जैसे तैसे समझाया कि तुझे कहाँ अभी के अभी कटप्पा को मारना है. कल संडे है, ले आयेंगे.’ पता नहीं मेरा ज़वाब उसकी समझ में आया कि नहीं. वो ठीक हैकहकर वापस बिस्तर में घुस गया. मैं छत में नज़रे गडाए सोच रहा था कि, आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यो मारा? :)  कमबख्त लाइफ सवालो से भरी पडी है. एक को हल करो उससे पहले दस नये उग आते हैं !!

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मैं हूँ कौन?

बहुत कुछ पसरा होता है हमारे आस-पास. और उसी को देखकर मन में जो कुछ भी सहज ही उपज जाए, उसी को यहाँ पेश करने की कोशिश कर रहा हूँ. मुख्यधारा की पत्रकारिता का हिस्सा रह चुका हूँ. 'राग-दरबारी' अलापना या 'घराना पत्रकारिता' करना खून में नहीं था सो फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. फीचर आलेख भी लिखे, कार्टून भी बनाए. कविता लिखने-पढने में गहरी दिलचस्पी.

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