आधा वंदे मातरम, पूरा राष्ट्रवाद !!



By: सत्यप्रकाश मिश्र
 
आज बडा उदास है मन। 
आज एक बार और मैने राष्ट्रवाद की बात करने वालों को राष्ट्रवाद के प्रतीक के चीथडे करते हुए देखा। 
कार्यक्रम महामहीम राज्यपाल, उत्तरप्रदेश श्री राम नाईक जी की पुस्तक `चरैवेती चरैवेती` के प्रकाशन का था। 
वंदे मातरम से कार्यक्रम आरंभ होना था। 
निर्धारित समय था सुबह ९:३० बजे। करीब एक घंटा देर से शुरू हुआ यह कार्यक्रम। मंच से मेरे नाम की पुकार हुई और मैं बडे उत्साह से माइक के सामने पहुँच गया। पर ये क्या? अगले ही पल मंच पर व्यवस्था संभाल रहे एक सज्जन ने मेरे कान में आकर कहा ``आधा वंदेमातरम ही गाना है, टाइम कम है।''  
सारे उत्साह पर मानो किसी ने ठंडा पानी डाल दिया। मन में आया कि मना कर दूं पर कुछ ही पल में मुझे उस भाई का ध्यान आया जिसने मुझे इस कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया था वंदेमातरम के लिए। मैं जीवन में पहली बार भारी मन से आधा अपंग सा मंत्र गाकर मंच से नीचे उतरा और सीधे प्रस्थान कर गया। 
राष्ट्रवाद की बात पर चुनाव लडने वाले लोग जब राष्ट्रगीत की बात आती है तो उसे काटने से चूकते नहीं हैं। कैसी विडंबना है और मैं ऐसी विचारधारा के लिए काम करता हूँ जो सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र का विचार करती है। और उसके लोग भी राष्ट्रवाद के लिए समर्पित हैं। मन में सवाल आया कि तीन मिनट का वंदे मातरम २ घंटे के कार्यक्रम पर भारी पड गया, जब कि मंच पर कई मिनटों तक बोलने वाले वक्ताओं की पूरी श्रृंखला रही होगी (रही होगी- इसीलिए कि मैं शुरू में ही सभागृह से निकल आया था)। 
क्या वक्ताओं का भाषण ३ मिनट कम करने का आग्रह मंच के कर्ताधर्ता नहीं कर सकते थे। 
पता नहीं मेरे ये विचार लोगों को कैसे लगेंगे लेकिन मैं मन में बोझ रखने का आदी नहीं हूँ आर इसीलिए अपने विचार इस संदेश के जरिए प्रेषित कर रहा हूँ। वंदेमातरम का गायन संसद में शुरू करवाने वाले राम नाईक जी के ही कार्यक्रम में आधे वंदेमातरम का गायन उस राष्ट्रवादी सिद्धांत को चिढाता हुआ नजर आ रहा है जिसके लिए आजन्म तन, मन, धन पूर्वक काम करने की प्रतिज्ञा लाखों लोगों ने ली है और हर साल लेते रहते हैं। 
खैर कोई बात नहीं, राष्ट्रवाद की भावना को जीवंत करने वाले वंदेमातरम का मंत्र आज भी राजनीतिक गलियारों में अपनी पूर्णता के लिए प्रतीक्षारत है।  










सत्यप्रकाश मिश्र, मुम्बईकर और राष्ट्रवादी विचारक



1 टिप्पणियाँ:

Unknown 13 November 2016 at 2:50 AM  

Sidhi satt...

मैं हूँ कौन?

बहुत कुछ पसरा होता है हमारे आस-पास. और उसी को देखकर मन में जो कुछ भी सहज ही उपज जाए, उसी को यहाँ पेश करने की कोशिश कर रहा हूँ. मुख्यधारा की पत्रकारिता का हिस्सा रह चुका हूँ. 'राग-दरबारी' अलापना या 'घराना पत्रकारिता' करना खून में नहीं था सो फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. फीचर आलेख भी लिखे, कार्टून भी बनाए. कविता लिखने-पढने में गहरी दिलचस्पी.

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