आम आदमी पर ख़ास सरकार की मार

कल पेट्रोल के दाम के बढाने के साथ ही सरकार ने 'आम आदमी' को ब्याज दरो का दोहरा झटका दिया है। एक बार फिर आर बी आई ने अपनी रेपो रेट बढ़ा दी है। नतीजन अब बैंको द्वारा भी लोन पर ब्याज दरे बढाने का सिलसिला चालू हो जाएगा। देश में आम आदमी महंगाई की मार से पहले से ही बेहाल है, लेकिन आम आदमी का नारा देकर सत्ता में आई यूपीए सरकार महंगाई कम करने में बार-बार नाकाम रही है।

दिलचस्प बात है सरकार को महंगाई पे काबू करने का एक ही तरीका सूझता है कि रेपो रेट बढ़ा दो। और इसी के चलते पिछले १८ महीनो में आरबीआई से १२ बार रेपो रेट बढ़वाई गयी। इससे इससे महंगाई पे काबू तो हो नहीं पाया, ऊपर से महंगाई और बढ़ गयी है। ये बात दीगर है कि रेपो रेट बढाने से घर आदि के लिए लोन ले चुके लोगों के लिए नई मुसीबत खड़ी हो रही है।

रेपो रेट बढाने के लिए सरकार हमेशा बेताब रहती है। उसे महंगाई घटाने के लिए आये दिन रेपो रेट बढाने का ही तरीका सूझता है। लेकिन सरकार महंगाई घटाने के लिए दूसरे विकल्पों पर गौर करने के लिए तैयार ही नहीं है। मसलन कालाबाजारी रोकना, सरकार की एफ़सीआई में लाखो टन अनाज सड़ जाता है लेकिन हमारे कृषि मंत्री शरद पवार उस अनाज को गरीबो में बंटवाने की इजाजत नहीं देते! ना ही सही ढंग से संभालने का बंदोबस्त करते हैं। कोर्ट की फटकार के बावजूद नहीं। क्या सरकारी निकम्मापन महंगाई का जिम्मेदार नहीं है? क्या इसे निकम्मेपन को दुरुस्त करने की जहमत सरकार उठाएगी?

इसी तरह सरकारी घोटालो आयोजनों में करोडो रुपये सरकार स्वाहा कर देती है। हालिया सी डब्लू जी घोटाला और २जी स्पेक्ट्रम की मिसाल हमारे सामने है। एकतरफ जनता कर और महंगाई के बोझ से कराह रही है, वही दूसरी तरफ सरकार जनता के पैसो को सी डब्लू जी जैसे बेमतलब के आयोजनों और उसमे घोटाले करके उड़ा रही है। दिल्ली सरकार ने तो दलितों-वंचितों के लिए आबंटित कोष को ही सी डब्लू जी में खर्च कर दिया!

महंगाई दर डबल डिजिट में बढ़ रही है, जबकि आम आदमी की कमाई में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। उसका बटुआ जस का तस है। दूसरी तरफ सरकार के मंत्रियो की दौलत २-३ साल में १४००% तक बढ़ी है!

कहने को तो देश में एक काबिल अर्थशास्त्री का राज है। लेकिन प्रधान मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह आर्थिक मोर्चे पर भी फिसड्डी साबित हो रहे हैं। सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मामले में तो सरकारी नाकामी देख ही रहे हैं।

ऐसे में एक फिल्मे लाइन याद आती है कि, बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी..!

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मैं हूँ कौन?

बहुत कुछ पसरा होता है हमारे आस-पास. और उसी को देखकर मन में जो कुछ भी सहज ही उपज जाए, उसी को यहाँ पेश करने की कोशिश कर रहा हूँ. मुख्यधारा की पत्रकारिता का हिस्सा रह चुका हूँ. 'राग-दरबारी' अलापना या 'घराना पत्रकारिता' करना खून में नहीं था सो फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. फीचर आलेख भी लिखे, कार्टून भी बनाए. कविता लिखने-पढने में गहरी दिलचस्पी.

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