बोले तो मुम्बई की घाई में व्यंग्य का झक्कास यज्ञ!

जन्म दिन पर विशेष
आपको शीर्षक पढ़कर थोड़ी हैरत जरूर हुई होगी, लेकिन अनूठी मुम्बईया हिन्दी में 'खाली-पीली' व्यंग्य लेखन करने वाले श्री यज्ञ शर्मा पर लिखे इसे लेख के लिए मुझे यही मुफीद लगा.

साल २००० का अगस्त का महीना. मुम्बई मेरे लिए बिल्कुल नया शहर था. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के करीब खड़ी इमारत की पांचवी मंजिल पर जिस शख्स से मिलने जा रहा था वह मेरे पसंदीदा लेखको में हैं.

विज्ञापन जगत में काफी वक्त गुजारने के बावजूद यज्ञ शर्मा खुद की विज्ञापनबाजी करने से गुरेज करते हैं. इसे यज्ञ शर्मा की प्रसिद्धी के प्रति उदासीनता कहिए या फिर बिल्कुल जमीन से जुड़ा खालिस सरल स्वभाव कि मैं तीसरी या चौथी मुलाक़ात के बाद ही जान पाया कि जिस व्यक्ति से मै इतनी बार मिला हूँ वह कोई और नहीं बल्कि नवभारत टाइम्स के वह ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार हैं जो 'खाली-पीली' लिखते हैं. जी हाँ अपने अनोखे अंदाज और विशिष्ट भाषा शैली के कारण यज्ञ शर्मा का 'खाली-पीली' कॉलम नवभारत टाइम्स में अपना ख़ास स्थान रखता था. झक्कास मुम्बइया इश्टाइल हिन्दी के कारण यह व्यंग्य के एलिट पाठको में ही नहीं बल्कि मुम्बई की लोकल में धक्के खाने वाले आम आदमी तक का पसंदीदा कॉलम रहा है. मजे की बात ये है कि कार्टूनिंग और व्यंग्य में रूचि के कारण मैं दक्षिणी राजस्थान के ठेठ देहात में रहने के बावजूद मुम्बई के अपने रिश्तेदारों से गाँव आते समय ‘खाली-पीली’ की कतराने मंगाता था. मै ही नहीं, ऐसे कई पाठक रहे हैं जो शनिवार की सुबह नवभारत टाइम्स खोलते ही सबसे उसमे 'खाली-पीली' ढूंढते थे.

मुम्बई की हिन्दी पत्रकारिता राजस्थान और अन्य उत्तर भारतीय प्रदेशो की तुलना में काफी अलग तरह की रही है. साहित्य के रूप में यहाँ न तो कोई बड़े-बड़े परिशिष्ट होते हैं और न ही अखबारों की कोई समृद्ध साहित्यिक परम्परा. मुम्बई में देश के नामी हिन्दी लेखक-साहित्यकार बसते हैं, लेकिन टाइम्स अंगरेजी की देसी कोपी बनते जा रहे हिन्दी अखबारों में या तो भरपूर बोलीवुड मसाले की नंगई होती है या फिर आधे पेज पर पसरी वर्ग पहेलियाँ. नतीजन मुम्बई में बसे हिन्दी लेखको का जितना आत्मीय रिश्ता हिन्दी-बेल्ट के पाठको से रहा है उतना शायद 'बाजू' के फ्लेट या 'खोली' में रहने वाले लोगो से भी नहीं रहता है.

यज्ञजी से मुलाक़ात के दौरान एक बार मैंने उनसे पूछने कि गुस्ताखी कर ही ली कि, सर खाली-पीली लिखने वाले यज्ञ शर्मा आप ही हैं? तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़ी सहजता से जवाब दिया था हाँ! इसके बाद तो मुम्बई की मार से दबा हुआ मेरे अन्दर का तथाकथित लेखक भी जाग गया और अक्सर साहित्य के बारे में चर्चा होती रहती. यज्ञ शर्मा जी के ही मुझे कारण हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर सूर्यभानू गुप्त से मिलाने का सौभाग्य भी मिला.

दुर्भाग्य से नवभारत टाइम्स मुम्बई का एक स्तरीय साहित्यिक स्तम्भ 'खाली-पीली' अब हमारे बीच नहीं रहा. कुछ साल पहले ही नभाटा ने इसे मुम्बई में प्रकाशित करना बंद कर दिया और दिल्ली से प्रकाशन जारी रखा. लेकिन सुना है अब दिल्ली में भी नहीं छाप रहे हैं. इसके बाद किसी और लेखक ने भी नभाटा में यज्ञ शर्मा की खाली-पीली शैली में व्यंग्य लिखने की कोशिश की लेकिन वह खाली-पीली 'टाइम पास' ही लगा. अब नभाटा में भर-भर कर बोलीवुड मसाले छपते हैं. यज्ञ शर्मा के ‘खाली-पीली’ के बिना उसका खालीपन साफ़ दिखता है. लेकिन यज्ञजी इसे भी सहजता से लेते हैं.
यज्ञ शर्मा के व्यंग्यो की खासियत ये रही है कि बिना तल्खी लिए भी यह असरदार वार करते हैं. बड़ी सहजता के साथ, उनकी शख्सियत की तरह ही. वह आप पर हमला करके चले जायेंगे और आप पहले सन्न होंगे फिर काफी देर बाद तक इसकी धार को महसूस करते रहेंगे.

हाल ही में हिन्दी व्यंग्य विधा के इस यशस्वी लेखक को दिल्ली में पंडित गोपालप्रसाद व्यास स्मृति व्यंग्यश्री सम्मान से नवाजा गया है.
उनका सम्मानित होना हम जैसे पाठको के लिए वाकई में खुशी की बात है. व्यंग्य लेखक के अलावा एक संवेदनशील कवि के रूप में भी स्थापित यज्ञ जी के व्यंग्य लेख अमर उजाला, दैनिक ट्रिब्यून, सन्मार्ग (कोलकाता), सेंटिनल (गौहाटी) और हिन्दी पोर्टल प्रभासाक्षी में भी लगातार छपते रहे हैं. इसके अलावा उनके व्यंग्य लेखों का सग्रह 'सरकार का घड़ा' भी प्रकाशित हुआ है. वह अमर चित्रकथा के सहयोगी सम्पादक के अलावा सचित्र विज्ञान पत्रिका के सम्पादक भी रहे.
इसे यज्ञजी की खूबी कहे या खामी लेकिन इतने साहित्यिक अवदान के बावजूद वह किसी साहित्यिक खेमेबाजी में नज़र नहीं आते.

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बहुत कुछ पसरा होता है हमारे आस-पास. और उसी को देखकर मन में जो कुछ भी सहज ही उपज जाए, उसी को यहाँ पेश करने की कोशिश कर रहा हूँ. मुख्यधारा की पत्रकारिता का हिस्सा रह चुका हूँ. 'राग-दरबारी' अलापना या 'घराना पत्रकारिता' करना खून में नहीं था सो फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. फीचर आलेख भी लिखे, कार्टून भी बनाए. कविता लिखने-पढने में गहरी दिलचस्पी.

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